Badrang zindagi !!!
वृहद् लम्ब आदिम वट पर बैठा किसी सरिता तट पर घनघोर मेंघों के नीचे सुदूर इंद्रधनुष के पीछे नंगे पाँव ठंडे रेतों पर चलता-चलता जाता काश! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा-लम्हा रंग पाता !! सोते-उठते, हटते-जुटते क्षडिक हर्ष पाते लुटते चिरांतन से जले दीर्घ मशालों में कुछ सुलझे-उलझे सवालों में गिरते- उठते कटु जीवन का कोई हल जो पा जाता काश ! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा- लम्हा रंग पाता !!! ठंडी पड़ती इन साँसों को पल-पल टूटती इन ाशों को जग के निर्मम उपहासों पर चलते-चलते निज प्रयासों पर बिखरे हौसले जोड़कर निज स्वार्थ तालियां बजाता काश ! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा-लम्हा रंग पाता !!!!