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Showing posts from August, 2017

Badrang zindagi !!!

वृहद् लम्ब आदिम वट पर बैठा किसी सरिता तट पर घनघोर मेंघों के नीचे सुदूर इंद्रधनुष के पीछे नंगे पाँव ठंडे रेतों पर चलता-चलता जाता काश! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा-लम्हा रंग पाता !! सोते-उठते, हटते-जुटते क्षडिक  हर्ष पाते लुटते चिरांतन से जले दीर्घ मशालों  में कुछ सुलझे-उलझे सवालों में गिरते- उठते कटु जीवन का कोई हल जो पा जाता काश ! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा- लम्हा रंग पाता !!! ठंडी पड़ती इन साँसों को पल-पल टूटती इन ाशों को जग के निर्मम उपहासों पर चलते-चलते निज प्रयासों पर बिखरे हौसले जोड़कर निज स्वार्थ तालियां बजाता काश ! के बदरंग ज़िन्दगी का लम्हा-लम्हा रंग पाता !!!!

Achchhe din ane wale hain

फ़ाग चलना बंद हुआ , अब छा गयी महंगाई ! गरीब अब करेगा रोज़ एक नयी लड़ाई ! प्याज़, टमाटर, मिरची ने कर दी है चढ़ाई ! बिन सब्ज़ी सुन पड़ेगी गरीबों की कढ़ाई ! उधर शाहब कहते-कहते थक गये, गरीबी नहीं गरीब को मिटाने वाले हैं ! अरे सबर करो भैया, बस अच्छे दिन आने वाले हैं !!            कर लो जितना करना हो महंगा,            ईंट ,बालू ,सरिया ,पत्थर ,            हम सबको आवास दिला देंगे !            भाई बहनो कहकर सर,            फेंककर घर बनवा देंगे !             मिलाओ सुर से सुर इनके तो ठीक,             विरोधी हवालात जाने वाले हैं !             थोड़ा ठहरो भैया,             अब तो अच्छे दिन आने वाले हैं!! जैसे- तैसे झेली थी नोटबंदी, अब जीएसटी समझ से परे है ! सभी चिल्ला रहे विकास रुक गया, साहब तो कहते की सो...